गुरुवार, 29 जनवरी 2009

बचपन का बो ज़माना.......!

बहुत याद आता है,
बचपन का बो ज़माना,
घंटों नदी में नहाना,
चुपके से आम तोड़कर चुराना,दिन भर गिल्ली-डंडा खेलना,
 पड़ोस वाली आंटी के घर के सीसे तोड़ना,
माँ से रोज़ डाट खाना ,
फिर प्यार से उनका बो मनाना,
दादा जी छड़ी लेकर भाग जाना,
तो कभी अम्मा का चस्मा छुपाना,
हर रात माँ से चाँद को पाने की जिद करना,
और फिर कहानी सुनते हुए नानी की गोद में सोना,
वो झूट-मूट का लड़ना-झगड़ना,
और फिर आपसमे एक-दुसरे को मनाना,
सच अब बहुत याद आता है ,
बचपन का बो ज़माना ......

1 टिप्पणी:

  1. बचपन के दिन भी क्या दिन थे।

    क्या आप हिन्दी फीड एग्रगेटर के साथ रजिस्टर नहीं हैं। यदि नहीं तो अवश्य करा लें इनकी सूची यहां है।

    कृपया वर्ड वेरीफिकेशन हटा लें। यह न केवल मेरी उम्र के लोगों को तंग करता है पर लोगों को टिप्पणी करने से भी हतोत्साहित करता है।

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